Tuesday, August 28, 2018

报告称中国应通过开采页岩气来“断煤”

英国海外发展研究所()最近发布报告称,如果严格落实水力压裂法中新兴污染防控措施,中国开采储量巨大的页岩气对环境产生的影响将十分有限。

海外发展研究所对中国页岩气前景进行评估后发现,开采过程对环境造成的众多影响均是“可控的”,并且可以纳入现有环境法律管辖范围之内。

报告指出:“整体而言,中国若用天然气彻底替代煤炭,那么开采页岩气将带来巨大的环境效益,并有助于中国能源体系转向以可再生能源为主的格局。”

海外发展研究所称其研究旨在采用“量化的、实证性的”方法来分析水力压裂技术对环境的正负效应。水力压裂技术是一种在高压状态下将掺入其他化学物质的水注入页岩层以释放天然气的技术。

报告还指出:“更大的障碍来自政治层面,即中国是否有足够的意愿和能力来限制煤炭生产、投资可再生能源以及严格执行环保法规和相关目标。”

压裂技术引起了激烈的争论,有反对者指出这一技术对水资源过于依赖,会给水资源稀缺或污染严重的国家带来巨大的用水压力。另外,压裂过程中需要使用大量化学物质,并且会导致钻探地区地震频率增加,这也是人们认为应严控甚至禁止压裂技术的主要原因之一。

报告称,压裂技术的环境影响虽然可控,但与其他行业相比,中国应对其进行更加严格的管控。

报告补充说,如果页岩气能够取代污染严重的煤炭,帮助中国城市治理空气污染,那么开采过程中不可避免的污染也是值得付出的代价。

煤炭也是导致气候变化的一个主要因素。中国计划在2030年达到温室气体排放峰值,并制定了煤炭消费总量控制目标。

据估计,中国的页岩气储量居世界首位,这将有助于中国以燃气电厂取代燃煤电厂,同时为间断性的风力和太阳能发电提供补充支持。

但是中国页岩气资源可能并不具备经济性,除非政府出资修建管网,将这种非常规天然气从偏远地区输送到需求较大的地区。

同时,为解决耗资巨大的开采过程所需的部分资金,能源市场也需要进行改革。由于地理环境制约,中国页岩气开采面临的困难将甚于美国。

此外,缺少具有竞争力的商业环境、成熟的法律体系和土地私有权制度,也阻碍了中国的页岩气革命。

水资源压力

一些分析人士指出,中国很多地区水资源日益稀缺,水力压裂技术对水资源的依赖将会进一步增加其成本。

世界资源研究所近期发布报告称,中国61%的页岩气资源位于水资源压力较大的地区或干旱地区,这意味着很多资源可能将无法开采。

海外发展研究所称,水力压裂最大的风险在于会污染地下水,处理、管理废水的成本有可能将进一步诱使施工方将废水直接排至地表或地下。

但报告也指出:“从整个矿区、地区甚至国家的资源储量来看,页岩气开采对水资源的需求并不算很高,与煤炭等行业也相当。”

上周发布的中国水资源保护行动计划制定了一系列目标以改善中国恶劣的水质,并针对造成河流、湖泊、近海和地下水污染的行业制定了更严厉的惩罚措施,但有中国水资源专家指出,行动计划成功的关键还在于地方干部要担负起责任。

Friday, August 17, 2018

ब्लॉग- अटल बिहारी वाजपेयी ने 'हिंदू हृदय सम्राट' मोदी के लिए रास्ता ऐसे तैयार किया

वाजपेयी की सबसे बड़ी ख़ासियत थी व्यक्तिगत व्यवहार में उनकी सह्रदयता, विपरीत विचार वाले लोगों को निजी शत्रु मानकर न चलना और ग़ज़ब का वाक्चातुर्य लेकिन, ये मानना नासमझी ही होगी कि इसका कारण सिर्फ़ उनका मधुर व्यवहार है. उनकी छवि ऐसी बनी या बनाई गई कि लोग ये तक भूल गए कि वे आख़िरकार एक राजनीतिक नेता थे.
राजनीति में छवि से बढ़कर कुछ नहीं, इसी छवि को जनसत्ता के पूर्व संपादक और नामी पत्रकार प्रभाष जोशी "संघ का मुखौटा" लिखते थे. वाजपेयी आजीवन संघ के प्रचारक रहे, इतने लंबे राजनीतिक जीवन में वे लगातार संघ के नुमाइंदे की ही तरह काम करते रहे.
2001 में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए उन्होंने न्यूयॉर्क में कहा था, "आज प्रधानमंत्री हूँ, कल नहीं रहूँगा लेकिन संघ का स्वयंसेवक पहले भी था और आगे भी रहूँगा."
उनकी ये बात बिल्कुल सच्ची, सही और पक्की है. वाजपेयी संघ के समर्पित प्रचारक थे, उन्हें आरएसएस ने जनसंघ में काम करने के लिए भेजा था, वे मोरारजी देसाई की सरकार में विदेश मंत्री बने जबकि आडवाणी सूचना-प्रसारण मंत्री. 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया था.
आगे चलकर समाजवादी धड़े के लोगों, ख़ास तौर से जॉर्ज फर्नांडिस ने ये मुद्दा उठाया कि दोहरी सदस्यता नहीं होनी चाहिए, यानी जो लोग जनता पार्टी में हैं वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य नहीं होने चाहिए, संघ के प्रति ये वाजपेयी-आडवाणी का समर्पण ही था कि उन्होंने सरकार छोड़ दी लेकिन संघ छोड़ने को राज़ी नहीं हुए.
इसी के बाद 1980 में जनसंघ नए रूप में सामने आया. पार्टी का नाम रखा गया भारतीय जनता पार्टी. बात मुख़्तसर ये है कि बीजेपी की पैदाइश से पहले से वाजपेयी-आडवाणी संघ के निर्देश पर ताल-मेल के साथ राजनीति करते रहे हैं और 2004 में इंडिया शाइनिंग वाला चुनाव हारने तक ये जोड़ी बनी रही और हिंदुत्व को पुख़्ता बनाने में जुटी रही.
ये बात अहम इसलिए है क्योंकि संघ वह संगठन है जिसका घोषित लक्ष्य भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है, हिंदू वर्चस्ववाद के मॉडल में जिसका विश्वास है, वो ऐसा संगठन है जो किसी के प्रति किसी तरह से उत्तरदायी नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक तरीक़े से चुना गया देश का प्रधानमंत्री अगर भाजपा से हो तो वह सरसंघचालक के आदेशों का पालन करता है.
अटल बिहारी वाजपेयी के निकट मित्रों में जसवंत सिंह भी रहे हैं. 1996 में प्रधानमंत्री बनने पर वाजपेयी ने जसवंत सिंह को वित्त मंत्री बनाया था. जब 1998 में वाजपेयी अपने मंत्रियों
अस्सी के दशक में अयोध्या आंदोलन की शुरूआत से लेकर 2004 तक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राम मंदिर, हिंदुत्व और गठबंधन सरकार सबको एक साथ साधने के लिए दो चेहरों की ज़रूरत महसूस की. सारे उग्र, कठोर और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाले काम लालकृष्ण आडवाणी कर रहे थे जबकि एनडीए को जोड़े रखने और शांति से सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी वाजपेयी की थी.
दोनों के बीच मतभेद और टकराव की बात को ज़्यादातर गंभीर पत्रकारों ने कभी गंभीरता से नहीं लिया, ये संघ के काम करने का तरीक़ा था. सच ये है कि आडवाणी और वाजपेयी मिलकर उस दिशा में काम करते रहे जिसे संघ की भाषा में 'परम लक्ष्य' कहा जाता है.
ये विशुद्ध रूप से छवि का मामला है. जान-बूझकर इस धारणा को बढ़ावा दिया गया कि वाजपेयी उदारवादी हैं और आडवाणी कट्टरपंथी. वक़्त-ज़रूरत के हिसाब से दोनों अपनी-अपनी भूमिका निभाते रहे हैं, वैसे दोनों में कोई ख़ास अंतर इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि संघ में वैचारिक भिन्नता की ख़ास गुंजाइश नहीं है. ठीक वैसे ही जैसे मार्क्सवाद में विश्वास के बिना आप कम्युनिस्ट पार्टी में तो नहीं हो सकते, उसी तरह हिंदुत्ववादी हुए बिना संघ में भला कोई कैसे रह सकता है?
कई ऐसी घटनाएँ हैं जिनसे आप समझ सकते हैं कि वाजपेयी की छवि चाहे जो हो लेकिन हिंदुत्व के मामले में वे लौहपुरूष कहे जाने वाले आडवाणी से कम कट्टर नहीं थे. बहुत सारे लोगों को याद होगा कि 2002 में जब गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए तो वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और मोदी राज्य के मुख्यमंत्री. मोदी को "राजधर्म निभाना चाहिए" और अपने "नागरिकों में धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए" वाला जुमला काफ़ी मशहूर हुआ था.
यह सदा सच बोलो, अपना काम मेहनत से करो, किसी का दिल मत दुखाओ जैसी ही बात थी. इस सुंदर वचन के अलावा उन्होंने कुछ ठोस नहीं किया, और तो और, गोवा में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में 12 अप्रैल को वाजपेयी ने जो भाषण दिया था वो बताता है कि मुसलमानों के बारे में इस 'उदार' नेता की सोच क्या थी. उन्होंने गोवा में दिए गए भाषण में कहा, "मुसलमान जहाँ कहीं भी हैं, वे दूसरों के साथ सह अस्तित्व पसंद नहीं करते, वे दूसरों से मेलजोल नहीं चाहते, अपने विचारों को शांति से प्रचारित करने की जगह वे अपने धर्म का प्रसार आतंक और धमकियों के ज़रिए करते हैं."
की सूची तैयार कर चुके थे जिसे राष्ट्रपति भवन भेजा जाना था तभी उस वक़्त के सरसंघचालक केसी सुदर्शन ने अचानक वाजपेयी से मुलाक़ात की और उनके कहने पर जसवंत सिंह का नाम सूची से हटा दिया गया.
अपने मंत्रिमंडल का चुनाव प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है लेकिन अगर पीएम का संबंध संघ से हो तो आजीवन पद पर रहने के लिए चुने गए सरसंघचालक के सामने यह विशेषाधिकार निरस्त हो जाता है, जसवंत सिंह की जगह यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री बनाया गया क्योंकि संघ सिंह को वित्त मंत्री के रूप में देखने को तैयार नहीं था.
मोदी सरकार तो बाक़ायदा आयोजन करके अपनी सरकार की प्रोग्रेस रिपोर्ट संघ नेतृत्व को सौंप चुकी है.
ये भी तय रणनीति का ही हिस्सा था कि आडवाणी, उमा भारती और मुरली मनोहर जोशी बाबरी मस्जिद विध्वंस का नेतृत्व करेंगे और वाजपेयी को इससे अलग रखा जाएगा. इस तरह ये भ्रम बना रहेगा कि वे उदारवादी हैं. ये भी तय किया गया कि वे विध्वंस के समय वहाँ नहीं होंगे, लेकिन उससे पहले 5 दिसंबर को उन्होंने लखनऊ में जो भाषण दिया उसे आप यहाँ सुन सकते हैं. इस भाषण में वाजपेयी आडवाणी से कम कट्टर कहाँ लगते हैं? वे अयोध्या में कारसेवा के दौरान "ज़मीन समतल" करने की बात करते सुने जा सकते हैं.
ऐसी ही एक पुरानी मिसाल है असम की जहाँ नल्ली में भयंकर जनसंहार हुआ. आज जबकि पूरे देश में एनआरसी का मुद्दा गर्म है, असम में 1983 में अटल बिहारी वाजपेयी ने एक विवादास्पद और भड़काऊ भाषण दिया था. इस भाषण में उन्होंने क्या कुछ कहा था आप यहाँ सुन सकते हैं.
इस भाषण से बीजेपी ने पल्ला झाड़ लिया, लेकिन 28 मार्च 1996 को अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान तत्कालीन गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त ने संसद में वाजपेयी के भाषणों के अंश पढ़कर सुनाए जिनमें कथित बांग्लादेशियों को बर्दाश्त न करने और उनके साथ हिंसक व्यवहार की बातें कही थीं.

Monday, August 13, 2018

盘点:环境公益诉讼的六个里程碑

1月1日,部分民间环保组织随着新环保法的实施获得了提起环境公益诉讼的资格;同年7月,13个省的检察院经全国人大授权也开始试行提起环境公益诉讼。至今,法院共受理了189件公益诉讼案件,其中约60%由民间组织提起。

环境公益诉讼往往承担着三重意义:除了解决案件涉及的具体环境问题,此类案件在媒体的关注下往往成为进行公民环境教育和法律教育的机会。此外,案件的审理还会为今后类似案件的办理留下范本。

今年全国“两会”期间,
最高人民法院就发布了一系列典型示范案件,并向公众公开。这些案件的处理方式无疑将成为此后各类原告提起环境公益诉讼的重要参考。中外对话梳理了其中较有影响力的六个案件,带您回顾中国环境公益诉讼发展历程中的里程碑。

天价污染的震慑力:泰州1.6亿天价赔偿案

江苏泰州六家化工企业将生产产生的2.5万多吨危险废物交给无处理资质的企业处理,后者将其倒入泰州的两条河流中,导致水体严重污染。

这起由社会组织“泰州市环保联合会”提起的公益诉讼,得到了法院支持,最终判定六个企业赔偿环境修复费用1.6亿,并承担10万元的污染鉴定费。

最高人民法院特邀咨询员吕忠梅认为,最高院的最终裁定对新环保法生效后个案裁判乃至司法规则的确立具有里程碑式的意义。而中国政法大学教授
王灿发看到了另一种趋势,即1.6亿赔偿的判决标志着通过公益诉讼让污染企业付出高代价的时代已经开启,具有强制执行条款的新环保法将让企业不得不警惕污染的成本。

沙漠不是垃圾场:腾格里沙漠污染系列民事诉讼案

跨西北三个省的腾格里沙漠并非不毛之地,沙漠中的零星湖泊和地下水系统养育维持着牲畜和牧民的生计。把未达标的废水直接排进沙漠时,当事的八家化工企业也许没有想到,在偏僻的沙漠里排污最终会给它们带来巨大的麻烦。

中国本土基金会“中国绿发会”(简称绿发会)于2015年8月向宁夏第一中级人民法院提起诉讼,要求八企业停止污染并修复生态环境,但法院认为绿发会并非《新环保法》规定的“专门从事环境保护公益活动”的社会组织,无诉讼资格,没有受理该案。

绿发会一直上诉至最高人民法院,最高院最终认定绿发会具有提起这起诉讼的资格,裁定原中级法院重新受理此案。最高院意见认为,对“专门从事环境保护公益活动”的理解,不能局限于直接改善环境的行为,应该将宣传教育、法律援助和公益诉讼等促进完善环境治理体系、提高环境治理能力的活动都算在内。

武汉大学教授王树义认为,最高院的裁定对类似案件有很好的指引和示范作用。因此,不论结果如何,这场目前尚未完结的诉讼已经具有了独特的价值。

如何计量空气污染伤害:
山东德州大气污染公益诉讼第一案

山东德州市内一玻璃厂临近居民生活区,其废气排放不达标令周围居民深受其害。环保部下属的NGO“中华环保联合”会将其告上法庭,法院于2016年7月20日一审判定其赔付因超标排放造成的损失超过2000万人民币。

中国人民大学教授周珂认为,由于大气污染和损害的因果关系难以认定、损害大小很难按照通常使用的污染损害鉴定法。该案是新《环境保护法》施行后第一起受到广泛关注的大气污染公益诉讼案件,而法院衡量被告的赔偿额度时采用的
虚拟成本法也广受关注。这种方法按照企业因逃避环保设备安装和使用节省下来的成本计算其应赔付的金额,为计算污染损害提供了一种思路。

地下水没有省界:三峡库区饮用水源污染公益诉讼案

一个临近重庆的湖北矿业公司未完成环评报告,就非法开矿作业,其废水和尾矿库直接排放到自然洼地中。当地属于喀斯特地貌,有害物质经由溶洞和裂缝扩散,污染了横跨两省的重要饮用水源地千丈岩水库。

重庆环保组织“重庆绿色志愿者联合会”将其告上法庭,要求其停止污染并避免后续污染。

一审和二审法院均支持原告请求,判定该矿业公司修复生态环境,并重新申请环境影响评价之后方可生产。

中国人民大学教授张新宝认为,尽管本案被告矿业公司地处湖北省,但由于受损害的千丈岩水库大部分处于重庆市辖区,由重庆当地法院受理名正言顺。可见,即使是跨省的污染,追求起责任来也有法可依。


农村污染应受重视:江苏养殖污染公益诉讼案

江苏江阴一个养殖合作社的养猪场,未经环评和验收就投入生产,严重污染了临近村庄。“中华环保联合会”提起诉讼,要求其停止违法养殖和排污行为并处置已产生的污染物、恢复被污染的水和土壤。

中国政法大学教授
王灿发认为,中国农村环境污染日益严重但一直未能得到养殖企业和地方政府的重视,这一判决为其他污染者敲响警钟,也为环境公益组织提出类似诉讼做出了示范。

检察院状告外地政府:贵州六盘非法堆放垃圾案

除了污染者,行政机关的监管不作为也可以通过法律手段去纠正,即使是跨辖区打官司也没问题。这起案件就是全国首例跨区执行的环境行政公益诉讼案。

在贵州六盘水市,一个镇将当地一块空地作为该镇临时生活垃圾堆放场,造成污染。与该镇相邻的另一个区的检察院因而将该镇政府告上法庭,要求其清除垃圾并恢复当地环境。

对环境公益诉讼案件实行跨区域管辖,有利于克服地方保护、督促行政机关依法履职。中国政法大学副校长马怀德认为,本案的监督效果十分明显,有示范效应。